
SC/ST Act पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अग्रिम जमानत पर सख्ती
New Delhi
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें आरोपी को अग्रिम जमानत दी गई थी। अदालत ने साफ कहा कि निचली अदालत ने गंभीर आरोपों को नज़रअंदाज़ किया और बिना ठोस आधार के राहत दी थी। इस आदेश से यह संदेश गया कि जातिवादी हमलों जैसे मामलों में ढील नहीं दी जा सकती।
एससी/एसटी एक्ट की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर पूर्ण प्रतिबंध बरकरार।
अदालत ने दोहराया कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 18 के अनुसार अग्रिम जमानत पर रोक है। इस प्रावधान का मकसद पीड़ितों को सुरक्षा और न्याय दिलाना है। इससे आरोपी गवाहों को प्रभावित करने या पीड़ितों को डराने-धमकाने की स्थिति में नहीं रह पाते।
कोर्ट ने कहा – केवल तभी छूट जब प्रथम दृष्टया अपराध साबित न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत सिर्फ तभी दी जा सकती है जब एफआईआर से कोई अपराध बनता ही न हो। अदालत ने कहा कि विस्तृत सबूतों की जांच ट्रायल में होगी, जमानत के समय केवल प्रथम दृष्टया तथ्यों पर विचार होगा।
महाराष्ट्र के धाराशिव जिले की घटना: चुनाव बाद जातिवादी हमले का मामला।
यह मामला विधानसभा चुनाव के बाद का है जब आरोपी ने वोट न देने पर पीड़ित और उसके परिवार पर हमला किया। एफआईआर में दर्ज है कि जातिसूचक गालियां दी गईं और शारीरिक हिंसा की गई। हमला केवल राजनीतिक मतभेद नहीं बल्कि जातिवादी उत्पीड़न से जुड़ा था।
एफआईआर में जातिसूचक शब्दों, महिलाओं से दुर्व्यवहार और हिंसा का जिक्र।
पीड़ित ने शिकायत में बताया कि आरोपी ने सार्वजनिक तौर पर “मांगत्यानों” जैसे अपशब्द कहे। उनकी मां और चाची के साथ मारपीट और साड़ी खींचने जैसी हरकतें हुईं। घर जलाने की धमकी दी गई और गहनों व सामान का नुकसान हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा – गवाहों के बयान और प्रमाण प्रथम दृष्टया अपराध साबित करते हैं।
अदालत ने पाया कि गवाहों के बयान एफआईआर के अनुरूप हैं और जातिवादी उत्पीड़न का प्रथम दृष्टया सबूत मौजूद है। इसलिए हाईकोर्ट द्वारा जमानत देना उचित नहीं था। अदालत ने दोहराया कि ऐसे मामलों में “मिनी ट्रायल” नहीं किया जा सकता।
फैसला संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता उन्मूलन) और सामाजिक न्याय को मजबूती देता है।
यह निर्णय अनुच्छेद 17 की भावना को मजबूत करता है, जो अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट का मकसद कमजोर वर्गों को सुरक्षा देना है, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।
दलित-आदिवासी संगठनों ने स्वागत किया, फैसले को न्याय और सुरक्षा की दिशा में अहम कदम बताया।
देशभर के दलित और आदिवासी संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया। उनका मानना है कि इससे अदालतों में एक समानता बनेगी और आरोपी को आसानी से राहत नहीं मिलेगी। संगठनों ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया।

